उजाले की रात


उजाले की इस रात में पडोसी का घर तम से क्यों घिरा है
खुशी के इस पर्व में वह आज बेजान गम में क्यों पड़ा है
चलो एक दीया आस का उसके आँगन में भी जलाये
उसकी इस खामोश जिन्दगी को रोशन हम बनाये

प्रदीप रावत "खुदेड़"

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