बसंत आ गया




सर्दियां के आँगन में खुशीयों के फूल मुरझा रहे थे,
जिंदगी के धगों को जितना सुलझाते,
वर्फीली हवा के थपेड़े उन्हें और उलझा रहे थे।

कंबल के अन्दर से जिंदगी झाँक रही थी,
कभी तो मिलेगा सकून, इस आस में,
कच्ची धुप को ताँक रही थी।
कुहासे की दिवारें रास्ता रोककर खड़ी थी,
भीगी हुयी लकड़ियाँ चुल्हे पर विरान पड़ी थी।

बस कट जाएँ लम्बी-लम्बी रातें,
बस फंट जाएँ सूरज से रोशनी की सौगातें।
पतझड़ ऐसा कि जिंदगी के पत्ते बृक्षों से टूट रहे थे,
हवाओं मे इस कदर नमी थी,
कि एक दूसरे के हाथों से हाथ छूट रहे थे।

बसंत आयेगा! कब आयेगा ? कैसे आयेगा ?
सब राह देख रहे थे।
एक दिन अचानक घर में खुशी छा गयी, हर्ष छा गया,
माँ आ गयी बसंत आ गया।

प्रदीप रावत "खुदेड़"

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